Tuesday, December 25, 2012

बीबी का बॉस



सुषमा  एक ३५ साल की शादी शुदा महिला है जिसका पति, विनोद कुमार, है। सुषमा  एक सुन्दर औरत है जो दिखने में एक २०-२२ साल की लड़की की तरह दिखती है। ५' २" ऊंचा कद, छोटे स्तन, गठीला सुडौल शरीर, रसीले होंट, काले लम्बे बाल ओर मोहक मुस्कान।
विनोद कुमार एक सेक्सी आदमी था जो की पत्नी को सिर्फ एक सेक्स का खिलौना समझता था। उसकी आवाज़ में कर्कशता और व्यवहार में रूखापन था। वोह रोज़ ऑफिस से आने के बाद अपने दोस्तों के साथ घूमने चला जाता था। उसको सेक्स और ब्लू फिल्म का शौक था जो उसे अपने पड़ोस में ही मुफ्त मिल जाते थे।

रोज़ वोह ब्लू फिल्म लगा कर देखता। फिर खाना खा कर अपनी पत्नी से सम्भोग करता। यह उसकी रोज़ की दिन चर्या थी।

बेचारी सुषमा  का काम सिर्फ सीधे या उल्टे लेट जाना होता था। विनोद कुमार बिना किसी भूमिका के उसके साथ सम्भोग करता जो कई बार सुषमा  को बलात्कार जैसा लगता था। उसकी कोई इच्छा पूर्ति नहीं होती थी ना ही उस से कुछ पूछा जाता था। वह अपने पति से बहुत तंग आ चुकी थी पर एक भारतीय नारी की तरह अपना पत्नी धर्म निभा रही थी। उसका पति उसका बिलकुल ध्यान नहीं रखता था। सम्भोग भी क्रूरता के साथ करता था। न कोई प्यारी बातें ना ही कोई प्यार का इज़हार। बस सीधा अपना लंड सुषमा  की चूत में घुसा देना। सुषमा  की चूत ज्यादातर सूखी ही होती थी और उसे इस तरह के सम्भोग से बहुत दर्द होता था। पर कुछ कह नहीं पाती थी क्योंकि पति घर में और भी बड़ा थानेदार होता था। इस पताड़ना से सुषमा  को महीने में पांच दिन की छुट्टी मिलती थी जब मासिक धर्म के कारण विनोद कुमार कुछ नहीं कर पाता था। विनोद कुमार की एक बात अच्छी थी की वो निरीक्षक होने के बावजूद भी पराई औरत या वेश्या के पास नहीं जाता था।

सुषमा  एक कंपनी में सेक्रेटरी का काम करती थी। वह एक मेहनती और ईमानदार लड़की थी जिसके काम से उसका बॉस बहुत खुश था। उसका बॉस एक ५० साल का सेवा-निवृत्त फौजी अफसर था। वह भी शादीशुदा था और एक दयालु किस्म का आदमी था। कई दिनों से वह नोटिस कर रहा था कि सुषमा  गुमसुम सी रहती थी। फौज में उसने औरतों का सम्मान करना सीखा था। उसे यह तो मालूम था कि उसका बेटा नहीं रहा पर फिर भी उसका मासूम दुखी चेहरा उसको ठेस पहुंचाता था। वह उसके लिए कुछ करना चाहता था पर क्या और कैसे करे समझ नहीं पा रहा था। वह उसके स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था। उधर सुषमा  अपने बॉस का बहुत सम्मान करती थी क्योंकि उसे अपने बॉस का अपने स्टाफ के प्रति व्यवहार बहुत अच्छा लगता था। बॉस होने के बावजूद वह सबसे इज्ज़त के साथ बात करता था और उनकी छोटी बड़ी ज़रूरतों का ध्यान रखता था। सिर्फ सुषमा  ही नहीं, बाकी सारा स्टाफ भी बॉस को बहुत चाहता था।

एक दिन, जब सबको महीने की तनख्वाह दी जा रही थी, बॉस ने सबको जल्दी छुट्टी दे दी। सब पैसे ले कर घर चले गये, बस सुषमा  हिसाब के कागजात पूरे करने के लिए रह गई थी। जब यह काम ख़त्म हो गया तो वह बॉस की केबिन में उसके हस्ताक्षर लेने गई। बॉस, जिसका नाम ललित है, उसका इंतज़ार कर रहा था। उसने उसे बैठने को कहा और उसका वेतन उसे देते हुए उसके काम की सराहना की। सुषमा  ने झुकी आँखों से धन्यवाद किया और जाने के लिए उठने लगी।

ललित ने उसे बैठने के लिए कहा और उठ कर उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने प्यार से उस से पूछा कि वह इतनी गुमसुम क्यों रहती है? क्या ऑफिस में कोई उसे तंग करता है या कोई और समस्या है?

सुषमा  ने सिर हिला कर मना किया पर बोली कुछ नहीं। ललित को लगा कि ज़रूर कोई ऑफिस की ही बात है और वह बताने से शरमा या घबरा रही है। उसने प्यार से उसके सिर पर हाथ फिराते हुए कहा कि उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं है और वह बेधड़क उसे सच सच बता सकती है। सुषमा  कुछ नहीं बोली और सिर झुकाए बैठी रही। ललित उसके सामने आ गया और उसकी ठोडी पकड़ कर ऊपर उठाई तो देखा कि उसकी आँखों में आँसू थे।
ललित ने उसके गालों से आँसू पौंछे और उसे प्यार से अपने सीने से लगा लिया। इस समय सुषमा  कुर्सी पर बैठी हुई थी और ललित उसके सामने खड़ा था। इसलिए सुषमा  का सिर ललित के पेट से लगा था और ललित के हाथ उसकी पीठ और सिर को सहला रहे थे। सुषमा  अब एक बच्चे की तरह रोने लग गई थी और ललित उसे रोने दे रहा था जिस से उसका मन हल्का हो जाये। थोड़ी देर बाद वह शांत हो गई और अपने आप को ललित से अलग कर लिया। ललित उसके सामने कुर्सी लेकर बैठ गया। पास के जग से एक ग्लास पानी सुषमा  को दिया। पानी पीने के बाद सुषमा  उठकर जाने लगी तो ललित ने उसे बैठे रहने को कहा और बोला कि अपनी कहानी उसे सुनाये। क्या बात है ? क्यों रोई ? उसे क्या तकलीफ है ?

सुषमा  ने थोड़ी देर इधर उधर देखा और फिर एक लम्बी सांस लेकर अपनी कहानी सुनानी शुरू की। उसने बताया किस तरह उसकी शादी उसकी मर्ज़ी के खिलाफ समाज के औसत आदमी के साथ करा दी थी जो उम्र में उस से 6 साल बड़ा था। उसके घरवालों ने सोचा था कि पुलिस वाले के साथ उसका जीवन आराम से बीतेगा और वह सुरक्षित भी रहेगी। उन्होंने यह नहीं सोचा कि अगर वह ख़राब निकला तो उसका क्या होगा? सुषमा  ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद अपने दाम्पत्य जीवन की कड़वाहट भी बता डाली। किस तरह उसका पति उसके शरीर को सिर्फ अपने सुख के लिए इस्तेमाल करता है और उसके बारे मैं कुछ नहीं सोचता। किस तरह उसके साथ बिना किसी प्यार के उसकी सूखी चूत का उपभोग करता है, किस तरह उसका वैवाहिक जीवन नर्क बन गया है किस तरह उसका पति उसके साथ ज़बरदस्ती सम्भोग करता था और अपने दोस्तों के सामने उसकी खिल्ली उड़ाता था।

ललित आराम से उसकी बातें सुनता रहा और बीच बीच में उसका सिर या पीठ सहलाता रहा। एक दो बार उसको पानी भी पिलाया जिस से सुषमा  का रोना कम हुआ और उसकी हिम्मत बढ़ी। धीरे धीरे उसने सारी बातें बता डालीं जो एक स्त्री किसी गैर मर्द के सामने नहीं बताती। सुषमा  को एक आजादी सी महसूस हो रही थी और उसका बरसों से भरा हुआ मन हल्का हो रहा था। कहानी ख़त्म होते होते सुषमा  यकायक खड़ी हो गई और ललित के सीने से लिपट गई और फिर से रोने लगी मानो उसे यह सब बताने की ग्लानि हो रही थी।

ललित ने उसे सीने से लगाये रखा और पीठ सहलाते हुए उसको सांत्वना देने लगा। सुषमा  को एक प्यार से बात करने वाले मर्द का स्पर्श अच्छा लग रहा था और वह ललित को जोर से पकड़ कर लिपट गई। ललित को भी अपने से 18 साल छोटी लड़की-सी औरत का आलंडन अच्छा लग रहा था। वैसे उसके मन कोई खोट नहीं थी और ना ही वह सुषमा  की मजबूरी का फायदा उठाना चाहता था। फिर भी वह चाह रहा था कि सुषमा  उससे लिपटी रहे।
थोड़ी देर बाद सुषमा  ने थोड़ी ढील दी और बिना किसी हिचकिचाहट के अपने होंट ललित के होंटों पर रख दिए और उसे प्यार से चूमने लगी। शायद यह उसके धन्यवाद करने का तरीका था कि ललित ने उसके साथ इतनी सुहानुभूति बरती थी। ललित थोड़ा अचंभित था। वह सोच ही रहा था कि क्या करे !

जब सुषमा  ने अपनी जीभ ललित के मुँह में डालने की कोशिश की और सफल भी हो गई। अब तो ललित भी उत्तेजित हो गया और उसने सुषमा  को कस कर पकड़ लिया और जोर से चूमने लगा। उसने भी अपनी जीभ सुषमा  के मुँह में डाल दी और दोनों जीभों में द्वंद होने लगा। अब ललित की कामुकता जाग रही थी और उसका लंड अंगडाई ले रहा था। एक शादीशुदा लड़की को यह भांपने में देर नहीं लगती। सो सुषमा  ने अपना शरीर और पास में करते हुए ललित के लंड के साथ सटा दिया। इस तरह उसने ललित को अगला कदम उठाने के लिए आमंत्रित लिया। ललित ने सुषमा  की आँख में आँख डाल कर कहा कि उसने पहले कभी किसी पराई स्त्री के साथ ऐसा नहीं किया और वह उसका नाजायज़ फायदा नहीं उठाना चाहता।

अब तो सुषमा  को ललित पर और भी प्यार आ गया। उसने कहा- आप थोड़े ही मेरा फायदा उठा रहे हो। मैं ही आपको अपना प्यार देना चाहती हूँ। आप एक अच्छे इंसान हो वरना कोई और तो ख़ुशी ख़ुशी मेरी इज्ज़त लूट लेता। ललित ने पूछा कि वह क्या चाहती है, तो उसने कहा पहले आपके गेस्ट रूम में चलते हैं, वहां बात करेंगे।
ऑफिस का एक कमरा बतौर गेस्ट-रूम इस्तेमाल होता था जिसमें बाहर से आने वाले कंपनी अधिकारी रहा करते थे। उधर रहने की सब सुविधाएँ उपलब्ध थीं। सुषमा , ललित का हाथ पकड़ कर, उसे गेस्ट-रूम की तरफ ले जानी लगी। कमरे में पहुँचते ही उसने अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया और ललित के साथ लिपट गई।

उसकी जीभ ललित के मुँह को टटोलने लगी। सुषमा  को जैसे कोई चंडी चढ़ गई थी। उसे तेज़ उन्माद चढ़ा हुआ था। उसने जल्दी से अपने कपड़े उतारने शुरू किए और थोड़ी ही देर में नंगी हो गई। नंगी होने के बाद उसने ललित के पांव छुए और खड़ी हो कर ललित के कपड़े उतारने लगी। ललित हक्काबक्का सा रह गया था। सब कुछ बहुत तेजी से हो रहा था और उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।

वह मंत्र-मुग्ध सा खड़ा रहा। उसके भी सारे कपड़े उतर गए थे और वह पूरा नंगा हो गया था। सुषमा  घुटनों के बल बैठ गई और ललित के लंड को दोनों हाथों से प्रणाम किया। फिर बिना किसी चेतावनी के लंड को अपने मुँह में ले लिया। हालाँकि ललित की शादी को २० साल हो गए थे उसने कभी भी यह अनुभव नहीं किया था। उसके बहुत आग्रह करने के बावजूद भी उसकी पत्नी ने उसे यह सुख नहीं दिया था। उसकी पत्नी को यह गन्दा लगता था। अर्थात, यह ललित के लिए पहला अनुभव था और वह एकदम उत्तेजित हो गया। उसका लंड जल्दी ही विकाराल रूप धारण करने लगा।

सुषमा  ने उसके लंड को प्यार से चूसना शुरू किया और जीभ से उसके सिरे को सहलाने लगी। अभी २ मिनट भी नहीं हुए होंगे कि ललित अपने पर काबू नहीं रख पाया और अपना लंड सुषमा  के मुँह से बाहर खींच कर ज़ोरदार ढंग से स्खलित हो गया। उसका सारा काम-मधु सुषमा  के स्तनों और पेट पर बरस गया। ललित अपनी जल्दबाजी से शर्मिंदा था और सुषमा  को सॉरी कहते हुए बाथरूम चला गया।

सुषमा  एक समझदार लड़की थी और आदमी की ताक़त और कमजोरी दोनों समझती थी। वह ललित के पीछे बाथरूम में गई और उसको हाथ पकड़ कर बाहर ले आई। ललित शर्मीला सा खड़ा था। सुषमा  ने उसे बिस्तर पर बिठा कर धीरे से लिटा दिया। उसकी टांगें बिस्तर के किनारे से लटक रहीं थीं और लंड मुरझाया हुआ था। सुषमा  उसकी टांगों के बीच ज़मीन पर बैठ गई और एक बार फिर से उसके लंड को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। मुरझाये लंड को पूरी तरह मुँह में लेकर उसने जीभ से उसे मसलना शुरू किया।

ललित को बहुत मज़ा आ रहा था। सुषमा  ने अपने मुँह से लंड अन्दर बाहर करना शुरू किया और बीच बीच में रुक कर अपने थूक से उसे अच्छी तरह गीला करने लगी। ललित ख़ुशी के मारे फूला नहीं समा रहा था। उसके हाथ सुषमा  के बालों को सहला रहे थे। धीरे धीरे उसके लंड में फिर से जान आने लगी और वह बड़ा होने लगा। अब तक सुषमा  ने पूरा लंड अपने मुँह में रखा हुआ था पर जब वह बड़ा होने लगा तो मुँह के बाहर आने लगा। वह उठकर बिस्तर पर बैठ गई और झुक कर लंड को चूसने लगी। उसके खुले बाल ललित के पेट और जांघों पर गिर रहे थे और उसे गुदगुदी कर रहे थे।

अब ललित का लंड बिलकुल तन गया था और उसकी चौड़ाई के कारण सुषमा  के दांत उसके लंड के साथ रगड़ खा रहे थे। अब तो ललित की झेंप भी जाती रही और उसने सुषमा  को एक मिनट रुकने को कहा और बिस्तर के पास खड़ा हो गया। उसने सुषमा  को अपने सामने घुटने के बल बैठने को कहा और अपना लंड उसके मुँह में डाल दिया। अब उसने सुषमा  के साथ मुख-मैथुन करना शुरू किया। अपने लंड को उसके मुँह के अन्दर बाहर करने लगा। शुरू में तो आधा लंड ही अन्दर जा रहा था पर धीरे धीरे सुषमा  अपने सिर का एंगल बदलते हुए उसका पूरा लंड अन्दर लेने लगी। कभी कभी सुषमा  को ऐसा लगता मानो लंड उसके हलक से भी आगे जा रहा है।

ललित को बहुत ज्यादा मज़ा आ रहा था। उसने अपने धक्के तेज़ कर दिए और मानो भूल गया कि वह सुषमा  के मुँह से मैथुन कर रहा है। सुषमा  को लंड कि बड़ी साइज़ से थोड़ी तकलीफ तो हो रही थी पर उसने कुछ नहीं कहा और अपना मुँह जितना ज्यादा खोल सकती थी खोल कर ललित के आनंद में आनंद लेने लगी। ललित अब दूसरी बार शिखर पर पहुँचने वाला हो रहा था। उसने सुषमा  के सिर को पीछे से पकड़ लिया और जोर जोर से उसके मुँह को चोदने लगा। जब उसके लावे का उफान आने लगा उसने अपना लंड बाहर निकालने की कोशिश की पर सुषमा  ने उसे ऐसा नहीं करने दिया और दोनों हाथों से ललित के चूतड पकड़ कर उसका लंड अपने मुँह में जितना अन्दर कर सकती थी, कर लिया। ललित इसके लिए तैयार नहीं था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह किसी लड़की के मुँह में अपने लावे का फव्वारा छोड़ पायेगा। इस ख़ुशी से मानो उसका लंड डेढ़ गुना और बड़ा हो गया और उसका क्लाइमेक्स एक भूकंप के बराबर आया। सुषमा  का मुँह मक्खन से भर गया पर उसने बाहर नहीं आने दिया और पूरा पी गई।
ललित ने अपना लंड सुषमा  के मुँह से बाहर निकाला और झुक कर उसे ऊपर उठाया। सुषमा  को कस कर आलंडन में भर कर उसने उसका जोरदार चुम्बन लिया जिसमे कृतज्ञता भरी हुई थी। सुषमा  के मुँह से उसके लावे की अजीब सी महक आ रही थी। दोनों ने देर तक एक दूसरे के मुँह में अपनी जीभ से गहराई से खोजबीन की और फिर थक कर लेट गए। ललित कई सालों से एक समय में दो बार स्खलित नहीं हुआ था। उसका लंड दोबारा खड़ा ही नहीं होता था। उसे बहुत अच्छा लग रहा था।

दिन के डेढ़ बज रहे थे। दोनों को घर जाने की जल्दी नहीं थी क्योंकि ऑफिस शाम ५ बजे तक का था और वैसे भी उन्हें ऑफिस में देर हो ही जाती थी। आमतौर पर वे ६-७ बजे ही निकल पाते थे। दोनों एक दूसरे की बाहों में लेट गए और न जाने कब सो गए। करीब एक घंटा सोने के बाद ललित की आँख खुली तो उसने देखा सुषमा  दोनों के टिफिन खोल कर खाना टेबल पर लगा रही थी। उसने अपने को तौलिये से ढक रखा था। ललित ने अपने ऑफिस की अलमारी से रम की बोतल और फ्रीज से कोक की बोतलें निकालीं और दोनों के लिए रम-कोक का ग्लास बनाया। सुषमा  ने कभी शराब नहीं पी थी पर ललित के आग्रह पर उसने ले ली। पहला घूँट उसे कड़वा लगा पर फिर आदत हो गई। दोनों ने रम पी और घर से लाया खाना खाया। खाने के बाद दोनों फिर लेट गए।

ललित को अचानक ध्यान आया कि अब तक उसने सुषमा  को ठीक से छुआ तक नहीं है। सारी पहल सुषमा  ने ही की थी। उसने करवट बदलकर सुषमा  की तरफ रुख़ किया और उसके सिर को सहलाने लगा। सुषमा  ने तौलिया लपेटा हुआ था। ललित ने तौलिये को हटाने के लिए सुषमा  को करवट दिला दी जिस से अब वह उल्टी लेटी हुई थी। ललित ने उसके हाथ दोनों ओर फैला दिए और उसकी टांगें थोड़ी खोल दीं। अब ललित उसकी पीठ के दोनों तरफ टांगें कर के घुटनों के बल बैठ गया और पहली बार उसने सुषमा  के शरीर को छुआ। उसके लिए किसी पराई स्त्री को छूने का यह पहला अनुभव था।

कुछ पाप बड़ा आनंद देते हैं। उसके हाथ सुषमा  के पूरे शरीर पर फिरने लगे। सुषमा  का स्पर्श उसे अच्छा लग रहा था और उसकी पीठ और चूतड़ का दृश्य उसमें जोश पैदा कर रहा था।

सुषमा  एक मलयाली लड़की थी जो नहाने के लिए साबुन का इस्तेमाल नहीं करती थी। उसे पारम्परिक मुल्तानी मिट्टी की आदत थी जिससे उसकी काया बहुत चिकनी और स्वस्थ थी। वह बालों में रोज़ नारियल तेल से मालिश करती थी जिस से उसके बाल काले और घने थे। इन मामलों में वह पुराने विचारों की थी। उसके पुराने विचारों में अपने पति की आज्ञा मानना और उसकी इच्छा पूर्ति करना भी शामिल था। यही कारण था की इतने दिनों से वह अपने पति का अत्याचार सह रही थी। ललित सुषमा  के शरीर को देख कर और छू कर बहुत खुश था। उसे उसके पति पर रश्क भी हो रहा था और गुस्सा भी आ रहा था कि ऐसी सुन्दर पत्नी को प्यार नहीं करता था।

ललित ने सुषमा  के कन्धों और गर्दन को मलना और उनकी मालिश करना शुरू किया। कहीं कहीं गाठें थी तो उन्हें मसल कर निकालने लगा। जब हाथ सूखे लगने लगे तो बाथरूम से तेल ले आया और तेल से मालिश करने लगा। जब कंधे हो गए तो वह थोड़ा पीछे खिसक गया और पीठ पर मालिश करने लगा। जब वह मालिश के लिए ऊपर नीचे होता तो उसका लंड सुषमा  की गांड से हलके से छू जाता।

सुषमा  को यह स्पर्श गुदगुदाता और वह सिहर उठती और ललित को उत्तेजना होने लगती। थोड़ी देर बाद ललित और नीचे खिसक गया जिस से लंड और गांड का संपर्क तो टूट गया पर अब ललित के हाथ उसकी गांड की मालिश करने लगे। उसने दोनों चूतडों को अच्छे से तेल लगाकर मसला और मसाज करने लगा। उसे बहुत मज़ा आ रहा था। सुषमा  भी आनंद ले रही थी। उसे किसी ने पहले ऐसे नहीं किया था। ललित के मर्दाने हाथों का दबाव उसे अच्छा लग रहा था। ललित अब उसकी जाँघों तक पहुँच गया था। ललित की उंगलियाँ उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को टटोलने लगी। सुषमा  ने अपनी टांगें थोड़ी और खोल दीं और ख़ुशी से मंद मंद करहाने लगी। ललित ने हल्के से एक दो बार उसकी चूत को छू भर दिया और फिर उसके घुटनों और पिंडलियों को मसाज करने लगा।

सुषमा  चाहती थी कि ललित चूत से हाथ न हटाये पर कसमसा कर रह गई। ललित भी उसे जानबूझ कर छेड़ रहा था। वह उसे अच्छी तरह उत्तेजित करना चाहता था। थोड़ी देर बाद सुषमा  के पांव अपने गोदी में रख कर सहलाने लगा तो सुषमा  एकदम उठ गई और अपने पांव सिकोड़ लिए। वह नहीं चाहती थी कि ललित उसके पांव दबाये। पर ललित ने उसे फिर से लिटा दिया और दोनों पांव के तलवों की अच्छी तरह से मालिश कर दी। सुषमा  को बहुत आराम मिल रहा था और न जाने कितने वर्षों की थकावट दूर हो रही थी। अब सुषमा  कृतज्ञता महसूस कर रही थी।

ललित ने सुषमा  को सीधा होने को कहा और वह एक आज्ञाकारी दासी की तरह उलट कर सीधी हो गई। ललित ने पहली बार ध्यान से सुषमा  के नंगे शरीर को सामने से देखा। जो उसने देखा उसे बहुत अच्छा लगा। उसके स्तन छोटे पर बहुत गठीले और गोलनुमा थे जिस से वह एक १६ साल की कमसिन लगती थी। चूचियां हलके कत्थई रंग की थी और स्तन पर तन कर मानो राज कर रही थी। ललित का मन हुआ वह उनको एकदम अपने मुँह में ले ले और चूसता रहे पर उसने धीरज से काम लिया।

हाथों में तेल लगा कर उसने सुषमा  की भुजाओं की मालिश की और फिर उसके स्तनों पर मसाज करने लगा। यह अंदाज़ लगाना मुश्किल था कि किसको मज़ा ज्यादा आ रहा था। थोड़ी देर मज़े लेने के बाद ललित ने सुषमा  के पेट पर हाथ फेरना शुरू किया। उसके पतले पेट पर तेल का हाथ आसानी से फिसल रहा था। उसने नाभि में ऊँगली घुमा कर मसाज किया और फिर हौले हौले ललित के हाथ उसके मुख्य आकर्षण की तरफ बढ़ने लगे।
सुषमा  ने पूर्वानुमान से अपनी टांगें और चौड़ी कर लीं। ललित ने हाथों में और तेल लगाकर सुषमा  की चूत के इर्द गिर्द सहलाना शुरू किया। कुछ देर तक उसने जानबूझ कर चूत को नहीं छुआ। अब सुषमा  को तड़पन होने लगी और वह कसमसाने लगी। ललित के हाथ नाभि से लेकर जांघों तक तो जाते पर चूत और उसके भग को नहीं छूते। थोड़ी देर तड़पाने के बाद जब ललित की उँगलियाँ पहली बार चूत की पलकों को लगीं तो सुषमा  उन्माद से कूक गई और उसका पूरा शरीर एक बार लहर गया। मसाज से ही शायद उसका स्खलन हो गया था, क्योंकि उसकी चूत से एक दूधिया धार बह निकली थी।

ललित ने ज्यादा तडपाना ठीक ना समझते हुए उसकी चूत में ऊँगली से मसाज शुरू किया और दूसरे हाथ से उसकी भगनासा को सहलाने लगा। सुषमा  की चूत मानो सम्भोग की भीख मांग रही थी और सुषमा  की आँखें भी ललित से यही प्रार्थना कर रही थीं। उधर ललित का लंड भी अंगडाई ले चुका था और धीरे धीरे अपने पूरे यौवन में आ रहा था।

ललित ने सुषमा  को बताया कि वह सम्भोग नहीं कर सकता क्योंकि उसको पास कंडोम नहीं है और वह बिना कंडोम के सुषमा  को जोखिम में नहीं डालना चाहता, इसलिए वह सुषमा  को उँगलियों से ही संतुष्ट कर देगा। पर सुषमा  ने ललित को बिना कंडोम के ही सम्भोग करने को कहा। उसने कहा- अगर कंडोम होता भी तो भी वह उसे इस्तेमाल नहीं करने देती। जबसे उसके बेटे की मौत हुई है उसे बच्चे की लालसा है और अगर बच्चा हो भी जाता है तो उसके घर में खुशियाँ आ जाएँगी। उसने भरोसा दिलाया कि वह कभी भी ललित को इस के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराएगी और ना ही कभी इसका हर्जाना मांगेगी।

उसने ललित को कहा कि अगर उसे सुषमा  पर भरोसा है तो हमेशा बिना कंडोम के ही सम्भोग करेंगे। उसने यह भी कहा कि जितना सुख उसे आज मिला है उसे १४ साल की शादी में नहीं मिला और वह चाहती है कि यह सुख वह भविष्य में भी लेती रहे। उसने कहा कि शायद वह एक निम्न चरित्र की औरत जैसी लग रही होगी पर ऐसी है नहीं और उसके लिए किसी गैर-मर्द से साथ ऐसा करना पहली बार हुआ है।

ललित ने उसे समझाया कि कई बार जल्दबाजी में लिए हुए निर्णय बाद में पछतावे का कारण बन जाते हैं इस लिए अच्छे से सोच लो।

सुषमा  ने कहा कि कोई भी औरत ऐसे निर्णय बिना सोचे समझे नहीं लेती। वह पूरे होशो-हवास में है और अपने निर्णय पर अडिग है और शर्मिंदा नहीं है।

ललित को सुषमा  के इस निश्चय और आत्मविश्वास पर गर्व हुआ और उसने तेल से सनी हुई सुषमा  को उठा कर सीने से लगा लिया। इस दौरान ललित का लंड मुरझा गया था। सुषमा  ने लंड की तरफ देखते हुए ललित को आँखों ही आँखों में आश्वासन दिलाया कि वह उस लंड में जान डाल देगी। उसने ललित को लिटा दिया और उसके ऊपर हाथों और घुटनों के बल आ गई। पहले उसने अपने बालों की लटों से उसके मुरझाये लंड पर लहरा कर गुदगुदी की और फिर अपने स्तनों से लंड को मसलने लगी। अपनी उभरी हुई चूचियों से उसने लंड को ऊपर से नीचे तक गुलगुली की। ललित का बेचारा लंड इस तरह के लुभाने का आदि नहीं था और जल्दी ही मरे से अधमरा हो गया।

सुषमा  ने ललित के लंड की नींव के चारों तरफ जीभ फिराना शुरू किया और उसकी छड़ चाटने लगी। एक एक करके उसने दोनों अण्डों को मुँह में लेकर चूस लिया। अपनी गीली जीभ को लंड के सुपारे पर घुमाने लगी और फिर उसके अधमरे लंड को पूरा मुँह में लेकर चूसने लगी। इस बार चूसते वक़्त वह लंड को निगलने की कोशिश कर रही थी और हाथों से उसके अण्डों को गुदगुदा रही थी। ललित को इतना मज़ा पहले कभी नहीं आया था। उसका लंड एक बार फिर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो गया।

उसके पूरे तरह से तने हुए लंड को सुषमा  ने एक बार और पुच्ची दी और ललित को बिना बताये उसके लंड पर अपनी चूत रखकर बैठ गई। ललित का मुश्तंड लंड उसकी गीली चूत में आसानी से घुस गया। सुषमा  ने अपने कूल्हों को गोल गोल घुमा कर ललित के लंड की चक्की चलाई और फिर ऊपर नीचे हो कर मैथुन के मज़े लूटने लगी। ललित भी अपनी गांड ऊपर उछाल उछाल कर सुषमा  के धक्कों का जवाब देने लगा। सुषमा  के स्तन मस्ती में उछल रहे थे और उसके चेहरे पर एक मादक मुस्कान थी। थोड़ी देर इस तरह करने के बाद ललित ने सुषमा  को अपनी तरफ खींच कर आलंडनबद्ध कर लिया और उसे पकड़े हुए और बिना लंड बाहर निकाले हुए पलट गया।

अब ललित ऊपर था सुषमा  नीचे और चुदाई लगातार चल रही थी। सुषमा  उसके प्रहारों का जमकर जवाब दे रही थी और अपनी तरफ से ललित के लंड को पूरी तरह अन्दर लेने में सहायता कर रही थी। दोनों बहुत मस्त थे। यकायक सुषमा  के मुँह से आवाजें आने लगीं- .. " ऊऊह आः हाँ हाँ .. और ज़ोर से ... हाँ हाँ .. चलते रहो ... और .. और .... मुझे मार डालो ... मेरे मम्मे नोंचो .... ऊऔउई ..."
ललित यह सुन कर और उत्तेजित हो कर ज़ोर ज़ोर से चोदने लगा। चार पांच छोटे धक्कों के बाद लंड पूरा बाहर निकाल कर पेलने लगा। जब वह ऐसा करता तो सुषमा  ख़ुशी से चिल्लाती " हाँ ऐसे ... और करो ....और करो .. "

ललित का स्खलन आम तौर पर 4-5 मिनटों में हो जाया करता था पर आज चूंकि यह उसका तीसरा वार था और उसे सुषमा  जैसी लड़की का सुख प्राप्त हो रहा था, उसका लंड मानो चरमोत्कर्ष तक पहुंचना ही नहीं चाहता था। यह जान कर ललित को अपने मर्दानगी पर नया गर्व हो रहा था और वह दुगने जोश से चोद रहा था।

उसने सुषमा  को अपने हाथों और घुटनों पर हो जाने को कहा और फिर पीछे से उसकी चूत में प्रवेश करके चोदने लगा। उसके हाथ सुषमा  के मम्मों को गूंथ रहे थे। अब हर बार उसका लंड पूरा बाहर आता और फिर एक ही झटके में पूरा अन्दर चला जाता। ललित ने एक ऊँगली सुषमा  की चूत-मटर के आस पास घुमानी शुरू की तो सुषमा  एक गेंद की तरह ऊपर नीचे फुदकने लगी। उस से इतना सारा मज़ा नहीं सहा जा रहा था।

उसकी उन्माद में ऊपर नीचे होने की गति बढ़ने लगी तो अचानक लंड फिसल कर बाहर आ गया। इस से पहले कि ललित लंड को फिर से अन्दर डालता सुषमा  ने करवट लेकर उसको अपने मुँह में ले लिया और अपने थूक से अच्छे से गीला कर दिया। और फिर अपनी चूत लंड की सीध में करके चुदने के लिए तैयार हो गई। ललित ने सुषमा  को फिर से पीठ के बल लेटने को कहा और आसानी से गीले लंड को फिच से अन्दर डाल दिया।

सुषमा  आराम से लेट गई और ललित भी उसके ऊपर पूरा लेट गया। लंड पूरा अन्दर था और ललित का वज़न थोड़ा सुषमा  के बदन पर और थोड़ा अपनी कोहनियों पर था। ललित के सीने के नीचे सुषमा  के सख्त बोबे पिचक रहे थे और तनी हुई चूचियां ललित को छेड़ रहीं थीं। रह रह कर ललित अपने कूल्हे ऊपर उठा कर अपने लंड को अन्दर बाहर करता रहता पर ज्यादातर बस सुषमा  पर लेटा रहता। वह बस इतनी ही हरकत कर रहा था जिस से उसका लंड शिथिल ना हो। उसने सुषमा  से पूछा कि वह ठीक है या उसे तकलीफ हो रही है ? जवाब मैं सुषमा  ने ऊपर हो कर उसके होटों पर पुच्ची दे दी।

ललित अब बहुत आराम से सम्भोग का मज़ा ले रहा था। उसने सुषमा  की भुजाओं को पूरा फैला दिया था और उसकी टांगों को जोड़ दिया था जिस से उसके लंड को चूत ने और कस लिया। जब ललित मैथुन का धक्का मरता तो उसे तंग और कसी हुई चूत मिलती। ललित को ऐसा लग रहा था मानो वह किसी कुंवारी बाला का पहला प्यार हो। उधर सुषमा  को टांगें बंद करने से ललित का लंड और भी मोटा लगने लगा था। दोनों के मज़े बढ़ गए थे। कुछ देर इसी तरह मगरमच्छ की तरह मैथुन करने के बाद ललित ने सुषमा  कि टांगें एक बार फिर खोल दीं और नीचे खिसक कर उसकी चूत मटर पर जीभ फेरने लगा।

सुषमा  को मानो करंट लग गया.वह उछल गई। ललित ने उसके मटर को खूब चखा। सुषमा  की चूत में पानी आने लगा और वह आपे से बाहर होने लगी। यह देखकर ललित फिर पूरे जोश के साथ चोदने लगा। पांच-छः छोटे धक्के और दो लम्बे धक्कों का सिलसिला शुरू किया। एक ऊँगली उसने सुषमा  की गांड में घुसा दी एक अंगूठा मटर पर जमा दिया। ललित को यह अच्छा लग रहा था कि उसे स्खलन का संकेत अभी भी नहीं मिला था। उसे एक नई जवानी का आभास होने लगा। इस अनुभूति के लिए वह सुषमा  का आभार मान रहा था। उसी ने उसमें यह जादू भर दिया था। वह बेधड़क उसकी चुदाई कर रहा था।

सुषमा  अब चरमोत्कर्ष की तरफ बढ़ रही थी। उसका बदन अपने आप डोले ले रहा था उसकी आँखें लाल डोरे दिखा रही थी, साँसें तेज़ हो रहीं थीं। स्तन उफ़न रहे थे और चूचियां नई ऊँचाइयाँ छू रहीं थीं। उसकी किलकारियां और सिसकियाँ एक साथ निकल रहीं थीं। सुषमा  ने ललित को कस के पकड़ लिया और उसके नाखून ललित कि पीठ में घुस रहे थे। वह ज़ोर से चिल्लाई और एक ऊंचा धक्का दे कर ललित से लिपट गई और उसके लंड को चोदने से रोक दिया। उसका शरीर मरोड़ ले रहा था और उसकी आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। थोड़ी देर में वह निढाल हो गई और बिस्तर पर गिर गई।

ललित ने अपना लंड बाहर निकालने की कोशिश की तो सुषमा  ने उसे रोक दिया, बोली कि थोड़ी देर रुक जाओ। मैं तो स्वर्ग पा चुकी हूँ पर तुम्हें पूरा आनंद लिए बिना नहीं जाने दूँगी। तुमने मेरे लिए इतना किया तो मैं भी तुम्हें क्लाइमेक्स तक देखना चाहती हूँ। ललित ने थोड़ी देर इंतज़ार किया। जब सुषमा  की चूत थोड़ी शांत हो गई तो उसने फिर से चोदना शुरू किया। उसका लंड थोड़ा आराम करने से शिथिल हो गया था तो ललित ने ऊपर सरक कर अपना लंड सुषमा  के मम्मों के बीच में रख कर रगड़ना शुरू किया। कुछ देर बाद सुषमा  ने ललित को अपने तरफ खींच कर उसका लंड लेटे लेटे अपने मुँह में ले लिया और जीभ से उसे सहलाने लगी।

बस फिर क्या था। वह फिर से जोश में आने लगा और देखते ही देखते अपना विकराल रूप धारण कर लिया। ललित ने मुँह से निकाल कर नीचे खिसकते हुए अपना लंड एक बार फिर सुषमा  की चूत में डाल दिया और धीरे धीरे चोदने लगा। उसकी गति धीरे धीरे तेज़ होने लगी और वार भी पूरा लम्बा होने लगा। सुषमा  भी साथ दे रही थी और बीच बीच में अपनी टांगें जोड़ कर चूत तंग कर लेती थी। ललित ने अपने शरीर को सुषमा  के सिर की तरफ थोड़ा बढ़ा लिया जिससे उसका लंड घर्षण के दौरान सुषमा  के मटर के साथ रगड़ रहा था। यह सुषमा  के लिए एक नया और मजेदार अनुभव था। उसने अपना सहयोग और बढ़ाया और गांड को ज़ोर से ऊपर नीचे करने लगी। अब ललित को उन्माद आने लगा और वह नियंत्रण खोने लगा। उसके मुँह से अचानक गालियाँ निकलनी लगीं," साली अब बोल कैसा लग रहा है? ... आआअह्ह्ह्हाअ अब कभी किसी और से मराएगी तो तेरी गांड मार दूंगा .... आह्हा कैसी अच्छी चूत है !! ..... मज़ा आ गया .... साली गांड भी मराती है क्या? ..... मुझसे मरवाएगी तो तुझे पता चलेगा ..... ऊओह ."
कहते हैं जब इंसान चरमोत्कर्ष को पाता है तो जानवर हो जाता है। कुछ ऐसा ही हाल ललित का हो रहा था। वह एक भद्र अफसर से अनपढ़ जानवर हो गया था। थोड़ी ही देर में उसके वीर्य का गुब्बारा फट गया और वह ज़ोर से गुर्रा के सुषमा  के बदन पर गिर गया और हांफने लगा। उसका वीर्य सुषमा  की चूत में पिचकारी मार रहा था। ललित क्लाइमेक्स के सुख में कंपकंपा रहा था और उसका फव्वारा अभी भी चूत को सींच रहा था। कुछ देर में वह शांत हो गया और शव की भांति सुषमा  के ऊपर पड़ गया।

ललित ने ऐसा मैथुनी भूकंप पहले नहीं देखा था। वह पूरी तरह निढाल और निहाल हो चुका था। उधर सुषमा  भी पूरी तरह तृप्त थी। उसने भी इस तरह का भूचाल पहली बार अनुभव किया था। दोनों एक दूसरे को कृतज्ञ निगाहों से देख रहे थे। ललित ने सुषमा  को प्यार भरा लम्बा चुम्बन दिया। अब तक उसका लंड शिथिल हो चुका था अतः उसने बाहर निकाला और उठ कर बैठ गया। सुषमा  भी पास में बैठ गई और उसने ललित के लंड को झुक कर प्रणाम किया और उसके हर हिस्से को प्यार से चूमा।

ललित ने कहा- और मत चूमो नहीं तो तुम्हें ही मुश्किल होगी।

सुषमा  बोली कि ऐसी मुश्किलें तो वह रोज झेलना चाहती है। यह कह कर उसने लंड को पूरा मुँह में लेकर चूसा मानो उसकी आखिरी बूँद निकाल रही हो। उसने लंड को चाट कर साफ़ कर दिया और फिर खड़ी हो गई।

घड़ी में शाम के छः बज रहे थे। उन्होंने करीब छः घंटे रति-रस का भोग किया था। दोनों थके भी थे और चुस्त भी थे। सुषमा  ललित को बाथरूम में ले गई और उसको प्यार से नहलाया, पौंछा और तैयार किया। फिर खुद नहाई और तैयार हुई। ललित के लंड को पुच्ची करते हुए उसने ललित को कहा कि अब यह मेरा है। इसका ध्यान रखना। इसे कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। मैं चाहती हूँ कि यह सालों तक मेरी इसी तरह आग बुझाये।

ललित ने उसी अंदाज़ में सुषमा  की चूत और गांड पर हाथ रख कर कहा कि यह अब मेरी धरोहर हैं। इन्हें कोई और हाथ ना लगाये। सुषमा  ने विश्वास दिलाया कि ऐसा ही होगा पर पूछा की गांड से क्या लेना देना? ललित ने पूछा कि क्या अब तक उसके पति ने उसकी गांड नहीं ली?

सुषमा  ने कहा- नहीं ! उनको तो यह भी नहीं पता कि यह कैसे करते हैं।

ललित ने कहा कि अगर तुम्हे आपत्ति न हो तो मैं तुम्हें सिखाऊंगा। सुषमा  राजी राजी मान गई। ललित ने अगले शुक्रवार के लिए तैयार हो कर आने को कहा और फिर दोनों अपने अपने घर चले गए।
घड़ी में शाम के छः बज रहे थे। उन्होंने करीब छः घंटे रति-रस का भोग किया था। दोनों थके भी थे और चुस्त भी थे। सुषमा  ललित को बाथरूम में ले गई और उसको प्यार से नहलाया, पौंछा और तैयार किया। फिर खुद नहाई और तैयार हुई। ललित के लंड को पुच्ची करते हुए उसने ललित को कहा कि अब यह मेरा है। इसका ध्यान रखना। इसे कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। मैं चाहती हूँ कि यह सालों तक मेरी इसी तरह आग बुझाये।

ललित ने उसी अंदाज़ में सुषमा  की चूत और गांड पर हाथ रख कर कहा कि यह अब मेरी धरोहर हैं। इन्हें कोई और हाथ ना लगाये। सुषमा  ने विश्वास दिलाया कि ऐसा ही होगा पर पूछा की गांड से क्या लेना देना? ललित ने पूछा कि क्या अब तक उसके पति ने उसकी गांड नहीं ली?

सुषमा  ने कहा- नहीं ! उनको तो यह भी नहीं पता कि यह कैसे करते हैं।

ललित ने कहा कि अगर तुम्हे आपत्ति न हो तो मैं तुम्हें सिखाऊंगा। सुषमा  राजी राजी मान गई। ललित ने अगले शुक्रवार के लिए तैयार हो कर आने को कहा और फिर दोनों अपने अपने घर चले गए।

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ललित अब अगले शुक्रवार की तैयारी में जुट गया। वह चाहता था कि अगली बार जब वह सुषमा  के साथ हो तो वह अपनी सबसे पुरानी और तीव्र इच्छा को पूरा कर पाए।

उसकी इच्छा थी गांड मारने की। वह बहुत सालों से इसकी कोशिश कर रहा था पर किसी कारण बात नहीं बन रही थी।

उसे ऐसा लगा कि शायद सुषमा  उसे खुश करने के लिए इस बात के लिए राज़ी हो जायेगी। उसे यह भी पता था कि उसकी यह मुराद इतने सालों से पूरी इसलिए नहीं हो पाई थी क्योंकि इस क्रिया मैं लड़की को बहुत दर्द हो सकता है इसीलिए ज्यादातर लड़कियाँ इसके खिलाफ होती हैं। उनके इस दर्द का कारण भी खुद आदमी ही होते हैं, जो अपने मज़े में अंधे हो जाते हैं और लड़की के बारे में नहीं सोचते।

ललित को वह दिन याद है जब वह सातवीं कक्षा में था और एक हॉस्टल में रहता था। तभी एक ग्यारहवीं कक्षा के बड़े लड़के, हर्ष ने उसके साथ एक बार बाथरूम में ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी तो ललित को कितना दर्द हुआ था वह उसे आज तक याद है।

ललित चाहता था कि जब वह अपनी मन की इतनी पुरानी मुराद पूरी कर रहा हो तब सुषमा  को भी मज़ा आना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो न केवल उसका मज़ा दुगना हो जायेगा, हो सकता है सुषमा  को भी इसमें इतना मज़ा आये की वह भविष्य में भी उससे गांड मरवाने की इच्छा जताए।

ललित को पता था कि गांड में दर्द दो कारणों से होता है। एक तो चूत के मुकाबले उसका छेद बहुत छोटा होता है जिससे लंड को प्रवेश करने के लिए उसके घेरे को काफी खोलना पड़ता है जिसमें दर्द होता है। दूसरा, चूत के मुकाबले गांड में कोई प्राकृतिक रिसाव नहीं होता जिस से लंड के प्रवेश में आसानी हो सके। इस सूखेपन के कारण भी लंड के प्रवेश से दर्द होता है। यह दर्द आदमी को भी हो सकता है पर लड़की (या जो गांड मरवा रहा हो) को तो होता ही है।

भगवान ने यह छेद शायद मरवाने के लिए नहीं बनाया था !!!

ललित यही सोच रहा था कि इस क्रिया को किस तरह सुषमा  के लिए बिना दर्द या कम से कम दर्द वाला बनाया जाए।

उसे एक विचार आया। उसने एक बड़े आकार की मोमबत्ती खरीदी और चाकू से शिल्पकारी करके उसे एक मर्द के लंड का आकार दे दिया। उसने यह देख लिया कि इस मोम के लंड में कहीं कोई खुरदुरापन या चुभने वाला हिस्सा नहीं हो।

उसने जानबूझ कर इस लंड की लम्बाई ९-१० इंच रखी जो कि आम लंड की लम्बाई से ३-४ इंच ज्यादा है और उसका घेरा आम लंड के बराबर रखा। उसने मोम के लंड का नाम भी सोच लिया। वह उसे "घनश्यामलंड" बुलाएगा !

उसने बाज़ार से एक के-वाई जेली का ट्यूब खरीद लिया। वैसे तो सुषमा  के बारे में सोच कर ललित को जवानी का अहसास होने लगा था फिर भी एहतियात के तौर पर उसने एक पत्ती तडालफ़िल की गोलियों की खरीद ली जिस से अगर ज़रुरत हो तो ले सकता है। वह नहीं चाहता था कि जिस मनोकामना की पूर्ति के लिए वह इतना उत्सुक है उसी की प्राप्ति के दौरान उसका लंड उसे धोखा दे जाये। एक गोली के सेवन से वह पूरे २४ घंटे तक "घनश्यामलंड" की बराबरी कर पायेगा।

अब उसने अपने हाथ की सभी उँगलियों के नाखून काट लिए और उन्हें अच्छे से फाइल कर लिया। एक बैग में उसने "घनश्यामलंड", के-वाई जेली का ट्यूब, एक छोटा तौलिया और एक नारियल तेल की शीशी रख ली। अब वह सुषमा  से मिलने और अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए तैयार था। बेसब्री से वह अगले शुक्रवार का इंतज़ार करने लगा।

उधर सुषमा  भी ललित के ख्यालों में गुम थी। उसे रह रह कर ललित के साथ बिताये हुए पल याद आ रहे थे। वह जल्द से जल्द फिर से उसकी बाहों में झूलना चाहती थी। ललित से मिले दस दिन हो गए थे। उस सुनहरे दिन के बाद से वे मिले नहीं थे। ललित को किसी काम से कानपुर जाना पड़ गया था। पर वह कल दफ्तर आने वाला था।

सुषमा  सोच नहीं पा रही थी कि अब दफ्तर में वह ललित से किस तरह बात करेगी या फिर ललित उस से किस तरह पेश आएगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि आम आदमियों की तरह वह उसकी अवहेलना करने लगेगा। कई मर्द जब किसी लड़की की अस्मत पा लेते हैं तो उसमें से उनकी रुचि हट जाती है और कुछ तो उसे नीचा समझने लगते हैं ....। सुषमा  कुछ असमंजस में थी ....।

लालसा, वासना, डर, आशंका, ख़ुशी और उत्सुकता का एक अजीब मिश्रण उसके मन में हिंडोले ले रहा था।

सुषमा  ने सुबह जल्दी उठ कर विशेष रूप से उबटन लगा कर देर तक स्नान किया। भूरे रंग की सेक्सी पैंटी और ब्रा पहनी जिसे पहन कर ऐसा लगता था मानो वह नंगी है। उसके ऊपर हलके बैंगनी रंग की चोली के साथ पीले रंग की शिफोन की साड़ी पहन कर वह बहुत सुन्दर लग रही थी। बालों में चमेली का गजरा तथा आँखों में हल्का सा सुरमा। चूड़ियाँ, गले का हार, कानों में बालियाँ और अंगूठियाँ पहन कर ऐसा नहीं लग रहा था कि वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रही हो। सुषमा  मानो दफ्तर भूल कर अपनी सुहाग रात की तैयारी कर रही थी।

सज धज कर जब उसने अपने आप को शीशे में देखा तो खुद ही शरमा गई। उसके पति ने जब उसे देखा तो पूछ उठा- कहाँ कि तैयारी है ...?
सुषमा  ने बताया कि आज दफ्तर में ग्रुप फोटो का कार्यक्रम है इसलिए सब को तैयार हो कर आना है !! रोज़ की तरह उसका पति उसे मोटर साइकिल पर दफ्तर तक छोड़ कर अपने काम पर चला गया। सुषमा  ने चलते वक़्त उसे कह दिया हो सकता है आज उसे दफ्टर में देर हो जाये क्योंकि ग्रुप फोटो के बाद चाय-पानी का कार्यक्रम भी है।

दफ्तर १० बजे शुरू होता था पर सुषमा  ९.३० बजे पहुँच जाती थी क्योंकि उसे छोड़ने के बाद उसके पति को अपने दफ्तर भी जाना होता था। सुषमा  ने ख़ास तौर से ललित का कमरा ठीक किया और पिछले १० दिनों की तमाम रिपोर्ट्स और फाइल करीने से लगा कर ललित की मेज़ पर रख दी।

कुछ देर में दफ्तर के बाकी लोग आने शुरू हो गए। सबने सुषमा  की ड्रेस की तारीफ़ की और पूछने लगे कि आज कोई ख़ास बात है क्या?

सुषमा  ने कहा कि अभी उसे नहीं मालूम पर हो सकता है आज का दिन उसके लिए नए द्वार खोल सकता है !!!

लोगों को इस व्यंग्य का मतलब समझ नहीं आ सकता था !!

वह मन ही मन मुस्कराई ....

ठीक दस बजे ललित दफ्तर में दाखिल हुआ। सबने उसका अभिनन्दन किया और ललित ने सबके साथ हाथ मिलाया। जब सुषमा  ललित के ऑफिस में उस से अकेले में मिली ललित ने ऐसे बर्ताव किया जैसे उनके बीच कुछ हुआ ही न हो। वह नहीं चाहता था कि दफ्तर के किसी भी कर्मचारी को उन पर कोई शक हो। सुषमा  को उसने दफ्तर के बाद रुकने के लिए कह दिया जिस से उसके दिल की धड़कन बढ़ गई।

किसी तरह शाम के ५ बजे और सभी लोग ललित के जाने का इंतजार करने लगे। ललित बिना वक़्त गँवाए दफ्तर से घर की ओर निकल पड़ा। शीघ्र ही बाकी लोग भी निकल गए। सुषमा  यह कह कर रुक गई कि उसे एक ज़रूरी फैक्स का इंतजार है। उसके बाद वह दफ्तर को ताला भी लगा देगी और चली जायेगी।

उसने चौकीदार को भी छुट्टी दे दी। जब मैदान साफ़ हो गया तो सुषमा  ने ललित को मोबाइल पर खबर दे दी। करीब आधे घंटे बाद ललित दोबारा ऑफिस आ गया और अन्दर से दरवाज़ा बंद करके दफ्टर की सभी लाइट, पंखे व एसी बंद कर दिए। सिर्फ अन्दर के गेस्ट रूम की एक लाइट तथा एसी चालू रखा।

अब उसने सुषमा  को अपनी ओर खींच कर जोर से अपने आलंडन में ले लिया और वे बहुत देर तक एक दूसरे के साथ जकड़े रहे। सिर्फ उनके होंठ आपस में हरकत कर रहे थे और उनकी जीभ एक दूसरे के मुँह की गहराई नाप रही थी। थोड़ी देर में ललित ने पकड़ ढीली की तो दोनों अलग हुए।

घड़ी में ५.३० बज रहे थे। समय कम बचा था इसलिए ललित ने अपने कपड़े उतारने शुरू किये पर सुषमा  ने उसे रोक कर खुद उसके कपड़े उतारने लगी। ललित को निर्वस्त्र कर उसने उसके लंड को झुक कर पुच्ची की और खड़ी हो गई।

अब ललित ने उसे नंगा किया और एक बार फिर दोनों आलंडन बद्ध हो गए। इस बार ललित का लंड सुषमा  की नाभि को टटोल रहा था। सुषमा  ने अपने पंजों पर खड़े हो कर किसी तरह लंड को अपनी चूत की तरफ किया और अपनी टांगें थोड़ी चौड़ी कर लीं। ललित का लंड अब सुषमा  की चूत के दरवाज़े पर था और सुषमा  उसकी तरफ आशा भरी नज़रों से देख रही थी। ललित ने एक ऊपर की तरफ धक्का लगाया और उसका लंड चूत में थोड़ा सा चला गया।

अब उसने सुषमा  को चूतड़ से पकड़ कर ऊपर उठा लिया और सुषमा  ने अपने हाथ ललित की गर्दन के इर्द-गिर्द कर लिए तथा उसकी टांगें उसकी कमर से लिपट गईं। अब वह अधर थी और ललित खड़ा हो कर उसे अपने लंड पर उतारने की कोशिश कर रहा था। थोड़ी देर में लंड पूरा सुषमा  की चूत में घुस गया या यों कहिये कि चूत उसके लंड पर पूरी उतर गई।

सुषमा  ने ऊपर नीचे हो कर अपने आप को चुदवाना शुरू किया। उसे बड़ा मज़ा आ रहा था क्योंकि ऐसा आसन उसने पहली बार ग्रहण किया था। कुछ देर के बाद ललित ने बिना लंड बाहर निकाले सुषमा  को बिस्तर पर लिटा दिया और उसके ऊपर लेट कर उसको जोर जोर से चोदने लगा। हालाँकि ललित आज सुषमा  की गांड मारने के इरादे से आया था पर काम और क्रोध पर किसका जोर चलता है !!

ललित २-३ मिनटों में ही बेहाल हो गया और उसकी पिचकारी सुषमा  की चूत में चूत गई। ललित की यही एक कमजोरी थी कि पहली बार उसका काम बहुत जल्दी तमाम हो जाता था। पर दूसरी और तीसरी बार जब वह सम्भोग करता था तो काफी देर तक डटा रह सकता था।

उसने लंड बाहर निकाला और सुषमा  को माथे पर पुच्ची करके बाथरूम चला गया। अपना लंड धो कर वह वापस आ गया। सुषमा  जब कुछ देर के लिए बाथरूम गई तो ललित ने एक गोली खा ली। शाम के ६ बज रहे थे। अभी भी उसके पास करीब २ घंटे थे। जब सुषमा  वापस आई तो ललित ने उससे पूछा कि वह कितनी देर और रुक सकती है।

सुषमा  ने भी अपने पति से देर से आने की बात कह दी थी सो उसे भी कोई जल्दी नहीं थी। तो ललित ने सोचा की शायद आज ही उसकी बरसों की मनोकामना पूरी हो जायेगी। उसने सुषमा  से पूछा वह उस से कितना प्यार करती है।

सुषमा  ने कहा- इम्तिहान ले कर देख लो !!

ललित ने कहा- कितना दर्द सह सकती हो?

सुषमा  ने कहा- जब औरत बच्चे को जन्म दे सकती है तो बाकी दर्द की क्या बात !!

यह सुन कर ललित खुश हो गया और सुषमा  को बिस्तर पर उल्टा लेटने के लिए बोला। सुषमा  एक अच्छी लड़की की तरह झट से उलटा लेट गई। ललित ने उसके पेट के नीचे एक मोटा तकिया लगा दिया जिस से उसकी गांड ऊपर की ओर और उठ गई।
ललित ने अपने बैग से तेल की शीशी, जेली का ट्यूब, छोटा तौलिया और "घनश्यामलंड" को निकाला और पास की मेज़ पर रख दिया। सुषमा  का मुँह तकिये में छुपा था और शायद उसकी आँखें बंद थीं। वह जानती थी कि क्या होने वाला है और वह ललित की खातिर कोई भी दर्द सहने के लिए तैयार थी।

ललित ने नारियल के तेल से सुषमा  के चूतड़ों की मालिश शुरू की। सुषमा  की मांस पेशियाँ जो कसी हुईं थीं उन्हें धीरे धीरे ढीला किया और उसके बदन से टेंशन दूर करने लगा। उसके हाथ कई बार उसकी चूत के इर्द गिर्द और उसके अन्दर भी आने जाने लगे थे। सुषमा  को आराम भी मिल रहा था और मज़ा भी आ रहा था।

इस तरह मालिश करते करते ललित ने सुषमा  की गांड के छेद के आस पास भी ऊँगली घुमाना शुरू किया और अच्छी तरह तेल से गांड को गीला कर दिया। अब उसने अपनी तर्जनी ऊँगली उसकी गांड में डालने की कोशिश की। ऊँगली गांड में थोड़ी सी घुस गई तो सुषमा  थोड़ी सी हिल गई।

ललित ने पूछा- कैसा लग रहा है?

तो सुषमा  ने कहा- अच्छा !

उसने कहा की अब वह ऊँगली पूरी अन्दर करने की कोशिश करेगा और सुषमा  को इस तरह जोर लगाना चाहिए जैसे वह शौच के वक़्त लगाती है। इससे गांड का छेद अपने आप ढीला और बड़ा हो जायेगा। सुषमा  ने वैसा ही किया और ललित की एक ऊँगली उसकी गांड में पूरी चली गई।

ललित ने कोई और हरकत नहीं की और ऊँगली को कुछ देर अन्दर ही रहने दिया। फिर उसने सुषमा  से पूछा- कैसा लग रहा है?

सुषमा  ने कहा- ठीक है।

तो ललित ने धीरे से अपनी ऊँगली बाहर निकाल ली।

अब उसने अपनी ऊँगली पर जेली अच्छी तरह से लगा ली और सुषमा  की गांड के बाहर और करीब आधा इंच अन्दर तक अच्छी तरह से जेली मल दी। अब उसने सुषमा  से कहा कि जब वह ऊँगली अन्दर की तरफ डालने की कोशिश करे उसी वक़्त सुषमा  को शौच वाला जोर लगाना चाहिए। जब दोनों ने ऐसा किया तो ऊँगली बिना ज्यादा मुश्किल के अन्दर चली गई।

ललित ने ऊँगली अन्दर ही अन्दर घुमाई और बाहर निकल ली। अब उसने अपनी दो उँगलियों पर जेली लगाई और वही क्रिया दोहराई। दो उँगलियों के अन्दर जाने में सुषमा  को थोड़ी तकलीफ हुई पर ज्यादा दर्द नहीं हुआ।

ललित हर कदम पर सुषमा  से उसके दर्द के बारे में पूछता रहता था। उसने इसीलिए अपनी उँगलियों के नाखून काट कर फाइल कर लिए थे वरना सुषमा  को अन्दर से कट लग सकता था...

एक दो बार जब दो उँगलियों से गांड में प्रवेश की क्रिया ठीक से होने लगी तो उसने दो उँगलियों को गांड के अन्दर घुमाना शुरू किया जिस से गांड का छेद और ढीला हो सके।

इसके बाद उसने "घनश्यामलंड" को निकाला और उसके अगले ४-५ इंच को अच्छी तरह जेली से लेप दिया। सुषमा  की गांड के छेद के इर्द गिर्द और अन्दर भी अच्छे से जेली लगा दी। अब ललित ने सुषमा  की टांगें थोड़ी और चौड़ी कर दी और घनश्यामलंड को उसकी गांड के छेद पर रख दिया। दूसरे हाथ से वह उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगा। घनश्यामलंड का स्पर्श सुषमा  को ठंडा लगा और उसकी गांड यकायक टाइट हो गई।

उसने पलट कर देखा तो घनश्यामलंड को देख कर आश्चर्यचकित रह गई। उसने ऐसा यन्त्र पहले नहीं देखा था। ललित ने बताया कि इसे उसने खुद ही बनाया है और इसको इस्तेमाल करके वह सुषमा  के दर्द को कम करेगा। उसने यह भी बताया कि इस यन्त्र का नाम "घनश्यामलंड" है। नाम सुन कर सुषमा  को हंसी आ गई।

ललित ने आश्वासन के तौर पर उसकी पीठ थपथपाई और फिर से उलटे लेट जाने को कहा। उसने सुषमा  को याद दिलाया की किस तरह (शौच की तरह) उसे अपनी गांड ढीली करनी है जिस से घनश्यामलंड गांड में जा सके। सुषमा  ने सिर हिला कर सहयोग करने का इशारा किया।

अब ललित ने कहा कि तीन की गिनती पर वह घनश्यामलंड को अन्दर करेगा। सुषमा  तैयार हो गई पर अनजाने में फिर उसकी गांड टाइट हो गई। ललित ने उसे घबराने से मना किया और उसकी चूत, पीठ तथा चूतड़ों पर प्यार से हाथ सहलाने लगा।

उसने कहा- जल्दबाजी की कोई ज़रुरत नहीं है। अगर तुम तैयार नहीं हो तो किसी और दिन करेंगे।

सुषमा  ने कहा- ऐसी कोई बात नहीं है और मैं तैयार हूँ !

ललित ने कहा "ओ के, अब मैं तीन गिनूंगा तुम तीन पर अपनी गांड ढीली करना"।

सुषमा  ने चूतड़ हिला कर हाँ का इशारा किया। ललित ने एक, दो, तीन कहते हुए तीन पर घनश्यामलंड को गांड के छेद में डालने के लिए जोर लगाया। पर सुषमा  की कुंवारी गांड घनश्यामलंड की चौड़ाई के लिए तैयार नहीं थी सो घनश्यामलंड अपने निशाने से फिसल गया और जेली के कारण बाहर आ गया। ललित की हंसी चूत गई और सुषमा  भी मुस्करा कर पलट गई।

ललित ने कहा- कोई बात नहीं, एक बार फिर कोशिश करते हैं।
उसने घनश्यामलंड के सुपारे पर थोड़ी और जेली लगाई और एक-दो-तीन कह कर फिर से कोशिश की। इस बार घनश्यामलंड करीब आधा इंच अन्दर चला गया। सुषमा  के मुँह से एक हलकी सी आवाज़ निकली।

ललित ने एकदम घनश्यामलंड को बाहर निकाल कर सुषमा  से पूछा कि कैसा लगा? दर्द बहुत हुआ क्या?

सुषमा  ने पलट कर उसके होटों पर एक ज़ोरदार चुम्मी की और कहा- तुम मेरा इतना ध्यान रख रहे हो तो मुझे दर्द कैसे हो सकता है !! अब मेरे बारे में सोचना बंद करो और घनश्यामलंडजी को अन्दर डालो।

यह सुनकर ललित का डर थोड़ा कम हुआ और उसने कहा- ठीक है, चलो इस बार देखते हैं तुम में कितना दम है !!

एक बार फिर जेली गांड और घनश्यामलंड पर लगा कर उसने एक-दो-तीन कह कर थोड़ा ज्यादा ज़ोर लगाया। इस बार घनश्यामलंड अचानक करीब डेढ़ इंच अन्दर चला गया और सुषमा  ने कोई आवाज़ नहीं निकाली। बस एक लम्बी सांस लेकर छोड़ दी। ललित ने घनश्यामलंड को अन्दर ही रहने दिया और सुषमा  की पीठ सहलाने लगा। उसने सुषमा  को शाबाशी दी और कहा वह बहुत बहादुर है।

थोड़ी देर बाद ललित ने सुषमा  को बताया कि अब वह घनश्यामलंड को बाहर निकालेगा। और फिर धीरे धीरे घनश्यामलंड को बाहर खींच लिया। उसने सुषमा  से पूछा उसे अब तक कैसा लगा तो सुषमा  ने कहा कि उसे दर्द नहीं हुआ और थोड़ा मज़ा भी आया।

ललित ने सुषमा  को आगाह किया कि इस बार वह घनश्यामलंड को और अन्दर करेगा और अगर सुषमा  को तकलीफ नहीं हुई तो घनश्यामलंड से उसकी गांड को चोदने की कोशिश करेगा। सुषमा  ने कहा वह तैयार है।

पर ललित ने एक बार फिर सब जगह जेली का लेप किया और तीन की गिनती पर घनश्यामलंड को घुमाते हुए उसकी गांड के अन्दर बढ़ा दिया। सुषमा  थोड़ा कसमसाई क्योंकि घनश्यामलंडजी इस बार करीब चार इंच अन्दर चले गए थे। ललित ने सुषमा  को और शाबाशी दी और कहा कि अब वह तीन की गिनती नहीं करेगा बल्कि सुषमा  को खुद अपनी गांड उस समय ढीली करनी होगी जब उसे लगता है कि घनश्यामलंड अन्दर जा रहा है।

यह कह कर उसने घनश्यामलंड को धीरे धीरे अन्दर बाहर करना शुरू किया। हर बार जब घनश्यामलंड को वह अन्दर करता तो थोड़ा और ज़ोर लगाता जिससे घनश्यामलंड धीरे धीरे अब करीब ६ इंच तक अन्दर पहुँच गया था। सुषमा  को कोई तकलीफ नहीं हो रही थी। यह उसके हाव भाव से पता चल रहा था। ललित ने सुषमा  की परीक्षा लेने के लिए अचानक घनश्यामलंड को पूरा बाहर निकाल लिया और फिर से अन्दर डालने की कोशिश की। सुषमा  चौकन्नी थी और उसने ठीक समय पर अपनी गांड को ढील दे कर घनश्यामलंड को अपने अन्दर ले लिया। ललित सुषमा  की इस बात से बहुत खुश हुआ और उसने सुषमा  की जाँघों को प्यार से पुच्ची कर दी।

अब वह घनश्यामलंड से उसकी गांड चोद रहा था और अपनी उँगलियों से उसकी चूत के मटर को सहला रहा था जिससे सुषमा  उत्तेजित हो रही थी और अपने बदन को ऊपर नीचे कर रही थी। कुछ देर बाद ललित ने घनश्यामलंड को धीरे से बाहर निकाला और सुषमा  को पलटने को कहा। उसने सुषमा  के पेट और मम्मों को पुच्चियाँ करते हुआ कहा कि उसके हिसाब से वह गांड मरवाने के लिए तैयार है।

सुषमा  ने कहा- हाँ, मैं तैयार हूँ पर ललित के लंड की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यह जनाब तो तैयार नहीं हैं, लाओ इन्हें मैं तैयार करूँ।

शाम के सात बज रहे थे। अभी एक घंटा और बचा था। सुषमा  की उत्सुकता देख कर उसका मन भी गांड मारने के लिए डोल उठा। उसके लंड पर सुषमा  की जीभ घूम रही थी और उसके हाथ ललित के अण्डों को टटोल रहे थे। साथ ही साथ गोली का असर भी हो रहा था।

थोड़ी ही देर में ललित का लंड ज़ंग के लिए तैयार हो गया। पहली बार गांड में घुसने की उम्मीद में वह कुछ ज़्यादा ही बड़ा हो गया था। सुषमा  ने उसके सुपारे को चुम्बन दिया और ललित के इशारे पर पहले की तरह उलटी लेट गई। ललित ने उसके कूल्हे थोड़े और ऊपर की ओर उठाये और टांगें और खोल दी। सुषमा  का सिर उसने तकिये पर रखने को कहा और छाती को बिस्तर पर सटा दिया। अब उसने सुषमा  की गांड की अन्दर बाहर जेली लगा दी और अपने लंड पर भी उसका लेप कर दिया। ललित ने पीछे से आ कर अपने लंड को उसकी गांड के छेद पर टिकाया और सुषमा  को पूछा कि क्या
सुषमा  तो तैयार ही थी। ललित ने धीरे धीरे लंड को अन्दर डालने के लिए ज़ोर लगाया पर कुछ नहीं हुआ। एक बार फिर सुपारे को छेद की सीध में रखते हुए ज़ोर लगाया तो लंड झक से फिसल गया और चूत की तरफ चला गया। ललित ने एक बार कोशिश की पर जब लंड फिर भी नहीं घुसा तो उसने फिर से घनश्यामलंड का सहारा लिया। घनश्यामलंड को जेली लगा कर फिर से कोशिश की तो घनश्यामलंड आराम से अन्दर चला गया। घनश्यामलंड से उसकी गांड को ढीला करने के बाद एक और बार ललित ने अपने लंड से कोशिश की।

पर उसका लंड घनश्यामलंड से थोड़ा बड़ा था और वह सुषमा  को दर्द नहीं पहुँचाना चाहता था शायद इसीलिए वह ठीक से ज़ोर नहीं लगा रहा था। सुषमा  ने मुड़ कर ललित की तरफ देखा और कहा- मेरी चिंता मत करो। मुझे अभी तक दर्द नहीं हुआ है। तुम थोड़ा और ज़ोर लगाओ और मैं भी मदद करूंगी।

ललित को और हिम्मत मिली और इस बार उसने थोड़ा और ज़ोर लगाया। उधर सुषमा  ने भी अपनी गांड को ढीला करते हुए पीछे की तरफ ज़ोर लगाया। अचानक ललित का लंड करीब एक इंच अन्दर चला गया। पर इस बार सुषमा  की चीख निकल गई। इतनी तैयारी करने के बाद भी ललित के लंड के प्रवेश ने सुषमा  को हिला दिया।

ललित को चिंता हुई तो सुषमा  ने कहा- अब मत रुकना।

ललित ने लंड का जो हिस्सा बाहर था उस पर और जेली लगाई और लंड को थोड़ा सा बाहर खींच कर एक और ज़ोर लगाया।

सुषमा  ने भी पीछे के तरफ ज़ोर लगाया और ललित का लंड लगभग पूरी तरह अन्दर चला गया। सुषमा  थोड़ा सा हिली पर फिर संभल गई। ललित से ज़्यादा सुषमा  के कारण उन्हें यह सफलता मिली थी।

अब ललित को अचानक अपनी सफलता का अहसास हुआ। उसका लंड इतनी टाइट सुरंग में होगा उसको अंदाजा नहीं था। उसे बहुत मज़ा आ रहा था। ख़ुशी के कारण उसका लंड शायद और भी फूल रहा था जिस से उसकी टाइट गांड और भी टाइट लग रही थी।
थोड़ी देर इस तरह रुकने के बाद उसने अपने लंड को हरकत देनी शुरू की। उसका लंड तो चूत का आदि था जिसमें अन्दर बाहर करना आसान होता है। गांड की और बात है। इस टाइट गुफा में जब उसने लंड बाहर करने की कोशिश की तो ऐसा लगा मानो सुषमा  की गांड लंड को अपने से बाहर जाने ही नहीं देना चाहती। फिर भी ललित ने थोड़ा लंड बाहर निकाला और जितना बाहर निकला उस हिस्से पर जेली और लगा ली। अब धीरे धीरे उसने अन्दर बाहर करना शुरू किया। बाहर करते वक़्त थोड़ा तेज़ और अन्दर करते वक़्त धीरे-धीरे की रफ्तार रखने लगा।

उसने सुषमा  से पूछा- कैसा लग रहा है?

तो सुषमा  ने बहुत ख़ुशी ज़ाहिर की। उसे वाकई बहुत मज़ा आ रहा था। उसने ललित को और ज़ोर से चोदने के लिए कहा। ललित ने अपनी गति बढ़ा दी और उसका लंड लगभग पूरा अन्दर बाहर होने लगा।................
ललित की तेज़ गति के कारण एक बार उसका लंड पूरा ही बाहर आ गया। अब वह इतनी आसानी से अन्दर नहीं जा रहा था जितना चूत में चला जाता है। उसने फिर से गांड में और लंड पर जेली लगाई और फिर पूरी सावधानी से लंड को अन्दर डाला। एक बार फिर सुषमा  की आह निकली पर लंड अन्दर जा चुका था। ललित ने फिर से चोदना शुरू किया। उसके लंड को गांड की कसावट बहुत अच्छी लग रही थी और उसे सुषमा  के पिछले शरीर का नज़ारा भी बहुत अच्छा लग रहा था।

अब उसने सुषमा  को आगे की ओर धक्का देते हुए बिस्तर पर सपाट लिटा दिया। वह भी उसके ऊपर सपाट लेट गया। सुषमा  पूरी बिस्तर पर फैली हुई थी। उसकी टांगें और बाजू खुले हुए थे और उसके चूतड़ नीचे रखे तकिये के कारण ऊपर को उठे हुए थे। ललित का पूरा शरीर उसके पूरे शरीर को छू रहा था। सिर्फ चोदने के लिए वह अपने कूल्हों को ऊपर नीचे करता था और उस वक़्त उनके इन हिस्सों का संपर्क टूटता था। ललित ने अपने हाथ सरका कर सुषमा  के बदन के नीचे करते हुए दोनों तरफ से उसके मम्मे पकड़ लिए। ललित का पूरा बदन कामाग्नि में लिप्त था और उसने इतना ज्यादा सुख कभी नहीं भोगा था। उधर सुषमा  ने भी इतना आनंद कभी नहीं उठाया था। उसके नितम्ब रह-रह कर ललित के निचले प्रहार को मिलने के लिए ऊपर उठ जाते थे जिससे लंड का समावेश पूरी तरह उसकी गांड में हो रहा था। दोनों सातवें आसमान पर पहुँच गए थे।

अब ललित चरमोत्कर्ष पर पहुँचने वाला था। उसके मुंह से मादक आवाजें निकलने लगी थी। सुषमा  भी अजीब आवाजें निकल रही थी। ललित ने गति तेज़ करते हुए एक बार लंड लगभग पूरा बाहर निकाल कर एक ही वार में पूरा अन्दर घुसेड़ दिया, सुषमा  की ख़ुशी की चीख के साथ ललित की दहाड़ निकली और ललित का वीर्य फूट फूट कर उसकी गांड में निकल पड़ा। सुषमा  ने अपनी गांड ऊपर की तरफ दबा कर उसके लंड को जितनी देर अन्दर रख सकती थी रखा। थोड़ी देर में ललित का लंड स्वतः बाहर निकल गया और सुषमा  की पीठ पर निढाल पड़ गया।

दोनों की साँसें तेज़ चल रही थी और दोनों पूर्ण तृप्त थे। ललित ने सुषमा  को उठा कर अपने सीने से लगा लिया। उसके पूरे चेहरे पर चुम्बन की वर्षा कर दी और कृतज्ञ आँखों से उसे निहारने लगा।

सुषमा  ने भी घुटनों के बल बैठ कर ललित के लंड को पुचकारा और और धन्यवाद के रूप में उसको अपने मुँह में ले कर चूसने लगी। उसकी आँखों में भी कृतज्ञता के आँसू थे। दोनों एक बार फिर आलंडनबद्ध होते हुए बाथरूम की तरफ चले गए।
उस दिन सुषमा  जब अपने घर पहुची तो वो बहुत थक चुकी थी, घर जाकर पहले उसने गर्म पानी से स्नान किया ओर फिर अपने कमरे मे जाकर बिस्तर पेर लेट गयी. लेटते ही उसकी आखो मे वो सारे लम्हे आ गये जो उसने ललित के साथ बिताए थे. फिर उसे अपना अतीत याद आ गया जब उसने पहली बार इस अनमोल सुख को भोगा था.....